नैनीताल :::- इस बार ज्येष्ठ पूर्णिमा व्रत 29 जून(सोमवार) को मनाया जाएगा। पंडित प्रकाश जोशी ने बताया इस दिन पूर्णिमा तिथि प्रातः 3:07 से प्रारंभ होगी और 30 जून को प्रातः 5:26 तक रहेगी। इस दिन मूल नक्षत्र 56 घड़ी 55 पल अर्थात अगले दिन प्रातः 4:04 तक रहेगा। शुक्ल योग 22 घड़ी 50 पल अर्थात दोपहर 2:26 तक रहेगा, विष्टि नामक करण 27 घड़ी 27 पल अर्थात शाम 4:17 तक रहेगा। सबसे महत्वपूर्ण यदि इस दिन के चंद्रमा की स्थिति को जानें तो इस दिन चंद्र देव पूर्ण रूप से धनु राशि में विराजमान रहेंगे।

इस वर्ष 2026 की ज्येष्ठ पूर्णिमा बहुत ही खास होने वाली है। इस दिन कई अद्भुत संयोग बन रहे हैं। इस बार ज्येष्ठ पूर्णिमा इसलिए खास मानी जायेगी क्योंकि इस दिन मूल नक्षत्र शुक्ल योग का शुभ संयोग बन रहा है और सोमवार का दिन होना भी उत्तम है। ऐसे शुभ योगों में किए गए कार्य हमेशा सफल होते हैं। ऐसे शुभ समय में किया गया निवेश बहुत लाभ प्रदान करता है। इस दिन की गई पूजा का फल कई गुना बढ़ जाता है और रुके हुए सारे कार्य स्वत: बनने लगेंगे।
इस दिन घर में सत्यनारायण की कथा करवायें। ऐसा करने से माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं। घर से हर प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा बाहर चली जाती है। अनावश्यक खर्च रुकते हैं और बरकत होने लगती है। इस दिन भगवान विष्णु को पीले फूल और मिठाई चढ़ाएं। इस दिन माता लक्ष्मी को खीर का भोग लगाना बहुत शुभ माना जाता है जिससे व्यापार और नौकरी में बड़ी उन्नति देखने को मिलती है।
हमारे ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन का कारक माना गया है। ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन चंद्रमा पृथ्वी के सबसे नजदीक होता है। इस कारण से चंद्रमा की सकारात्मक ऊर्जा बहुत तेज होती है। यदि आपका मन अशांत रहता है तो यह दिन मन को शांत करने के लिए अति उत्तम दिन है। इस दिन रात को चांद की रोशनी में अवश्य बैठना चाहिए चांद को देखते हुए ॐ सोम सोमाय नम:
मंत्र का जाप करें ऐसा करने से मन की उलझने दूर हो जाती हैं और तनाव कम होता है, और शांति मिलती है। इस दिन रात्रि के समय चंद्रमा निकलने के बाद जल में दूध अक्षत और सफेद पुष्प मिलाकर अर्घ्य अर्पित करें, ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ऐसा करने से भी मानसिक तनाव कम होता है।

ज्येष्ठ पूर्णिमा व्रत की अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित है जिसमें से एक इस प्रकार है-
प्राचीन काल में वृन्दारक नाम का एक प्रसिद्ध ब्राह्मण था। वह वेद शास्त्रों का ज्ञाता धनवान तथा अनेक संबंधों से युक्त था। उसकी पत्नी देवसेना अत्यंत रूपवती और सद्गुणों से संपन्न थी। दोनों ने लंबे समय तक सुख पूर्वक जीवन व्यतीत किया। समय बीतने पर वृन्दारक वृद्ध हो गया, परंतु उसे संतान प्राप्त नहीं हुई। पुत्र हीनता के कारण वह अत्यंत दुखी रहने लगा। उसने अनेक व्रत पूजा और धार्मिक अनुष्ठान किये, इसके बावजूद भी उसे संतान का सुख प्राप्त न हुआ। निराश होकर वह प्राण त्यागने के उद्देश्य से वन में चला गया।
वन में उसने भोजन और निद्रा का त्याग कर तपस्या आरंभ की, उसने अन्न जल त्याग दिया। चौथे दिन बहुत दुर्बल होकर मूर्छित हो गया। इस समय भगवान विष्णु ब्राह्मण का रूप धारण कर उसके सामने प्रकट हुए और उसकी व्यथा का कारण पूछा वृंदारक ने सारी कथा सुना दी।
भगवान ने उसे ज्येष्ठ मास में विशेष व्रत करने का उपदेश दिया। उन्होंने कहा कि पूरे मास प्रातः काल स्नान करें, ब्रह्मचारी का पालन करें, हविष्य अन्न ग्रहण करें, त्रिविक्रम भगवान की पूजा करें, दही भात का नैवेद्य अर्पित करें तथा ब्राह्मणों के घरों में जल दान करें। ऐसा करने से उसे योग्य पुत्र की प्राप्ति होगी। वृन्दारक ने भगवान की आज्ञा का पालन किया। एक दिन नदी तट पर उसे एक अत्यंत भूखा बाघ दिखाई दिया। भय के कारण उसने अपने जलपात्र का जल उस पर डाल दिया। जैसे ही जल की बूंदे बाघ को स्पर्श हुई तो वह बहुत दिव्य स्वरूप धारण कर बोला कि वह पूर्व जन्म में हिंसक बहेलिया था और अपने पापों के कारण बाघ की योनि में जन्मा है। उसने ब्राह्मण से अपने किए व्रत का पुण्य अपने को दान करने की प्रार्थना की। दयालु वृंदारक ने अपने संचित मास व्रत के पुन्य को उसे अर्पित कर दिया। उस पुण्य के प्रभाव से वह तुरंत स्वर्ग लोक को प्राप्त हुआ। इसके बाद वृन्दारक ने पुनः श्रद्धापूर्वक ज्येष्ठ मास का व्रत किया। इसके प्रभाव से उसे एक तेजस्वी वैष्णव और भगवान विष्णु का भक्त पुत्र प्राप्त हुआ।
इस कथा के अतिरिक्त दक्षिण भारत में इस दिन वट सावित्री व्रत भी मनाया जाता है। जिस प्रकार उत्तर भारत में ज्येष्ठ अमावस्या को वट सावित्री अमावस्या व्रत मनाया जाता है ठीक इसी प्रकार दक्षिण भारत के महाराष्ट्र आदि राज्यों में ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट सावित्री पूर्णिमा व्रत मनाया जाता है।

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