नैनीताल :::- जागर उत्तराखंडक कुमाऊँ और गढ़वाल में लगाई जाण वालि एक सांस्कृतिक, आध्यात्मिक,पारंपरिक  और संगीत पर आधारित हमार दयाप्तों और पितरौक पूज पाठेक रीत छू।

जागर किलै लगाई जैं-
जागरक माध्यमल उत्तराखंडक पहाड़ी लोग आपण कुलक दयाप्त, गौक दयाप्त, गोल गंगनाथ, ऐरी और पितरौक आत्माओं आराध्ना कर बेर उनूकै जगौनी, उनूकै बुलौनी।
जागर लगौन लिजी घरक सयाड मुखिया दूयी महत्वपूर्ण लोगों कै निमंत्रण दिबेर बुलौनी।
जगरी और डंगरी
जगरी एक पारंपरिक लोक गायक हूँ जो हुडका और ढोल दमाऊँक ताल पर देवी-देवताओंक स्तुति कर बेर पौराणिक गाथाओं कै गै-गै बेर उनुकै बुलौनी।
जगरिक संगीतल और मंत्रौक शक्तिल देवी दयाप्त और पितर डंगरिक शरीर में प्रवेश करनी। तब डंगरी कै भगवानक अवतार कयी जा। डंगरी लोगूक परेशानियोंक समस्याक समाधान बतूनी।
जागर उत्तराखंडेक लोगूक आस्था और संगीतक संगम छू।
जो लोगौंक (मनखी) और भगवानक बीचक सीध बात करणक रीति और माध्यम छू। जागर कुमाऊँ और गढवाल में पीढियों बै चली ऐरै परम्परा छू।
इकै अघिल पीढ़ी तक पहुँचुण भौत जरूरी छू। ताकि आजकलक नई पीढिक नान, नानतिन जागरक बार में जाण सको। उत्तराखंडेक संस्कृति और आस्था दगण जुडि रै सको।

आलेख – रश्मि परिहार

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