नैनीताल:::- उत्तराखंड के लोग मां नंदा देवी को अपनी अधिष्ठात्री देवी मानते हैं। लोककथाओं में मां नंदा को हिमालय की पुत्री तथा देवी पार्वती का स्वरूप माना गया है। नंदा देवी महोत्सव धार्मिक आस्था और लोक संस्कृति के साथ ही प्रकृति एवं पर्यावरण संरक्षण का महत्वपूर्ण संदेश भी देता है।
प्रो. ललित तिवारी ने बताया कि संस्कृत में नंदा का अर्थ आनंद या खुशी देने वाली देवी से है। महोत्सव में मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं का निर्माण प्राकृतिक अवयवों से पारंपरिक विधि से किया जाता है। कदली के तने, हरे बांस, कपास और कपड़े के साथ प्राकृतिक रंगों का प्रयोग प्रतिमा निर्माण में किया जाता है। भृंगराज के आसन और डहेलिया के पुष्पों की माला का भी धार्मिक महत्व है। मां को ब्रह्मकमल अर्पित करने की परंपरा भी महोत्सव का हिस्सा है।
उन्होंने बताया कि महोत्सव में चावल अर्पित करने और प्राकृतिक अनाज व गेहूं से प्रसाद तैयार करने की परंपरा प्रकृति के साथ मनुष्य के गहरे जुड़ाव को दर्शाती है। महोत्सव के दौरान पौधारोपण कर हिमालयी पर्यावरण के संरक्षण का संदेश भी दिया जाता है। प्लास्टिक से दूरी बनाए रखने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर भी जोर दिया जाता है।

प्रो. तिवारी ने कहा कि नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व अपनी समृद्ध जैव विविधता और वन्यजीवों के लिए प्रसिद्ध है। यह हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हिमालय के जंगल, बुग्याल, जलस्रोत और जैव विविधता नदियों, भूमि की उर्वरता और पेयजल व्यवस्था से सीधे जुड़े हैं। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के दौर में इन प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और भी जरूरी हो गया है।
उन्होंने कहा कि मां नंदा के प्रति लोगों की अगाध श्रद्धा वास्तव में पहाड़ों के जंगलों, बुग्यालों, प्राकृतिक संसाधनों और जैव विविधता के प्रति प्रेम एवं संरक्षण की भावना को मजबूत करती है। महोत्सव हमें आस्था के साथ हिमालय को बचाने और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति को सुरक्षित रखने का संदेश देता है।

