नैनीताल :::- चतुर्थी व्रत भगवान श्री गणेश को समर्पित है परंतु ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को भगवान श्री गणेश के साथ भगवान श्री कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न को भी विशेष रूप से पूजा जाता है।
इसलिए इस दिन को प्रद्युम्न चतुर्थी व्रत के नाम से भी जाना जाता है।

पंडित प्रकाश जोशी इस बार 18 जून गुरुवार को प्रद्युम्न चतुर्थी व्रत मनाया जाएगा। इस दिन यदि नक्षत्र के राजा कहे जाने वाला पुष्य नक्षत्र की बात करें तो 15 घड़ी 40 पल अर्थात प्रातः 11:32 तक यह नक्षत्र रहेगा। व्याघ्र योग शाम 5:35 तक रहेगा। चंद्रदेव इस दिन पूर्ण रूप से कर्क राशि में विराजमान रहेंगे। इस दिन गुरु पुष्य के साथ सर्वार्थ सिद्धि योग भी बना रहेगा।
सनातन धर्म में भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न का विशेष स्थान माना गया है। पुराणों में प्रद्युम्न को भगवान कामदेव का अवतार बताया गया है। उनका जन्म भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणी के घर हुआ था। प्रद्युम्न चतुर्थी का पर्व उनके दिव्य जीवन, अद्भुत पराक्रम और उनसे जुड़ी चमत्कारिक घटनाओं की स्मृति में मनाया जाता है।
मान्यता है कि इस दिन भक्त भगवान श्री गणेश,भगवान श्रीकृष्ण, माता रुक्मिणी और प्रद्युम्न का पूजन कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह तिथि यदुवंश के गौरवशाली इतिहास और द्वारका से जुड़ी महत्वपूर्ण पौराणिक घटनाओं का स्मरण कराती है।
श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के 55वें अध्याय में प्रद्युम्न जन्म का उल्लेख मिलता है। पुराणों के अनुसार प्रद्युम्न भगवान श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणी के ज्येष्ठ पुत्र थे। उनका जन्म द्वारका में अत्यंत शुभ नक्षत्रों और मंगलमय योग में हुआ था। उनके जन्म से पूरे यदुवंश में हर्ष का वातावरण छा गया था। ऋषि-मुनियों ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक असाधारण तेज, पराक्रम और दिव्य गुणों से युक्त होगा, भगवान कामदेव का पुनर्जन्म थे। कहा जाता है कि जब भगवान शिव ने अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था, तब उनकी पत्नी रति ने उन्हें पुनः प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की। उसी तपस्या के फलस्वरूप दूसरे जन्म में उन्हें प्रद्युम्न के रूप में प्राप्त हुये।
प्रद्युम्न के जन्म के समय भविष्यवाणी हुई थी कि शम्बरासुर नामक शक्तिशाली असुर का वध उनके हाथों होगा। यह जानकर शम्बरासुर भयभीत हो गया और उसने बालक प्रद्युम्न को बचपन में ही समाप्त करने की योजना बना ली।
पुराणों के अनुसार, प्रद्युम्न के जन्म के कुछ ही दिनों बाद शम्बरासुर मायावी रूप धारण कर उन्हें द्वारका से चुरा ले गया। उस समय प्रद्युम्न मात्र दस दिन के थे। असुर ने उन्हें समुद्र में फेंक दिया ताकि भविष्य में उसका विनाश न हो सके।

समुद्र में फेंके जाने के बाद एक विशाल मछली ने प्रद्युम्न को निगल लिया। कुछ समय बाद वह मछली मछुआरों के जाल में फंस गई और उसे शम्बरासुर के महल में भेज दिया गया।
जब महल की रसोई में मछली को काटा गया तो उसके भीतर से एक जीवित बालक निकला। यह देखकर सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए। उसी समय महल में रहने वाली मायावती ने उस बालक को अपने संरक्षण में ले लिया।

पौराणिक कथाओं के अनुसार मायावती कोई साधारण स्त्री नहीं थीं। वे पूर्व जन्म में रति थीं, जो कामदेव की पत्नी थीं। देवर्षि नारद ने उन्हें बताया कि यह बालक कोई और नहीं, बल्कि उनके पति कामदेव का पुनर्जन्म है, जो अब प्रद्युम्न के रूप में जन्मे हैं।इसके बाद मायावती ने प्रद्युम्न का पालन-पोषण किया और उन्हें विभिन्न विद्याओं तथा मायावी शक्तियों का ज्ञान दिया। समय के साथ प्रद्युम्न एक तेजस्वी, पराक्रमी और अद्वितीय योद्धा बन गए।

जब प्रद्युम्न को अपने वास्तविक जन्म और जीवन का रहस्य पता चला, तब उन्होंने शम्बरासुर का सामना करने का निर्णय लिया। मायावती ने उन्हें असुर की मायावी शक्तियों को निष्प्रभावी करने की विशेष विद्या भी सिखाई।इसके बाद दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। शम्बरासुर ने अपनी समस्त मायावी शक्तियों का प्रयोग किया, लेकिन प्रद्युम्न ने अपनी दिव्य शक्ति और युद्ध कौशल से उसकी हर माया को नष्ट कर दिया। अंततः द्वारका में हुआ भावुक पुनर्मिलन शम्बरासुर का वध करने के बाद प्रद्युम्न मायावती के साथ द्वारका पहुंचे। उनका स्वरूप और तेज भगवान श्रीकृष्ण से इतना मिलता-जुलता था कि लोग उन्हें स्वयं श्रीकृष्ण समझ बैठे।माता रुक्मिणी ने जब उन्हें देखा तो उनके हृदय में मातृत्व की भावना जागृत हुई। उसी समय देवर्षि नारद ने पूरी घटना का वर्णन किया और बताया कि यही वह बालक है जो जन्म के कुछ दिनों बाद लापता हो गया था। यह सुनकर श्रीकृष्ण, रुक्मिणी और समस्त यदुवंश आनंद से भर उठा। वर्षों बाद पुत्र को पाकर माता रुक्मिणी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। इसलिए प्रद्युम्न चतुर्थी भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के दिव्य जीवन और उनसे जुड़ी पौराणिक घटनाओं की स्मृति में मनाई जाती है। इस दिन श्रद्धालु उनके जन्म, चमत्कारिक रूप से जीवित बचने, शम्बरासुर के वध और माता-पिता से पुनर्मिलन की कथा का स्मरण करते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण, माता रुक्मिणी और प्रद्युम्न का विधि-विधान से पूजन किया जाता है। कई स्थानों पर भक्त इस दिन ब्राह्मण देव के श्री मुख से प्रद्युम्न कथा का श्रवण और पाठ भी करते हैं।

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