नैनीताल:::- मां नंदा-सुनंदा महोत्सव के लिए तैयार की जा रही प्रतिमाओं में धार्मिक आस्था के साथ प्रकृति एवं हिमालय संरक्षण का संदेश भी समाहित है। प्रतिमाओं का निर्माण पारंपरिक एवं पर्यावरण अनुकूल सामग्री से किया जा रहा है। इसमें कदली वृक्ष, हरे बांस, रुई, कॉटन का कपड़ा, प्राकृतिक रंग और भृंगराज के आसन का प्रयोग किया जाता है। यह सभी सामग्री प्राकृतिक रूप से गलनशील होने के कारण पर्यावरण के लिए अनुकूल मानी जाती है।
मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं का निर्माण नैनीताल के लोक पारंपरिक कलाकारों द्वारा वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार किया जाता है। कलाकार प्रतिमाओं को तैयार करने में धार्मिक मान्यताओं के साथ स्थानीय कला एवं संस्कृति का भी विशेष ध्यान रखते हैं।
इस वर्ष प्रतिमा निर्माण में चंद्रप्रकाश साह, गोधन सिंह, हीरा रावत, गोविंद सिंह बिष्ट, चिराग बिष्ट, अमर साह, दीपक गुरुरानी, भोला वर्मा, आनंद बिष्ट, हिमांशु गुप्ता, मोनिका साह, सौरभ दास, मेघा बिष्ट, नेहा विश्वेश गंगोला, सुमन, मेघा सागर सोनकर, नितेश मेहरा और अमित बिष्ट समेत अन्य कलाकार जुटे हुए हैं।
मूर्ति निर्माण की यह परंपरा नई पीढ़ी के कलाकारों तक पहुंचाने में पूर्व में स्वर्गीय गंगा प्रसाद साह, ठाकुर दास साह, रमेश लाल चौधरी और पूरण लाल साह का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
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नैनीताल : कदली, बांस और प्राकृतिक रंगों से तैयार हो रही मां नंदा-सुनंदा की मूर्ति

