नैनीताल :::- अधिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को परमा एकादशी नाम से जाना जाता है। यह सर्वोत्तम एकादशी व्रत है प्रत्येक तीसरे वर्ष यह व्रत आता है। इस एकादशी व्रत का फल अन्य एकादशी व्रत से हजारों गुना अधिक फलदाई होता है।
पंडित प्रकाश जोशी ने बताया इस बार 11 जून ( गुरुवार ) को सर्वार्थ सिद्धि योग में यह व्रत मनाया जाएगा। इस दिन यदि एकादशी तिथि की बात करें तो 43 घड़ी 22 पल अर्थात रात्रि 10:36 तक एकादशी तिथि रहेगी। रेवती नामक नक्षत्र सात घड़ी 32 पल अर्थात प्रातः 8:16 तक रहेगा, शोभन योग 49 घड़ी 22 पल अर्थात रात्रि 1:00 बजे तक रहेगा। देव प्रातः 8:16 तक मीन राशि में विराजमान रहेंगे तदुप्रांत चंद्रदेव मेष राशि में प्रवेश करेंगे। सबसे महत्वपूर्ण यदि इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग की बात करें तो यह योग प्रातः 5:15 से अगले दिन प्रातः 5:15 तक रहेगा।
परमा शब्द का अर्थ होता है सर्वोत्तम और पापों से मुक्ति दिलाने वाला। पौराणिक कथाओं में वर्णन मिलता है की धन के देवता कुबेर ने इसी व्रत के प्रभाव से भगवान शिव की कृपा प्राप्त कर देवताओं के कोषाध्यक्ष का पद पाया था। वहीं सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने भी परमा एकादशी के पुण्य प्रभाव से अपना खोया हुआ वैभव और परिवार पुनः प्राप्त किया था। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और नियम पूर्वक इस व्रत का पालन करता है उसे अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
स्कंद पुराण में दान का उल्लेख करते हुए कहा गया है-:
न्यायोपार्जितवित्तस्य दशमांशेन धीमत:।
कर्तव्यो विनियोगश्च ईश्वरप्रीत्यधर्मेव च।
अर्थात बुद्धिमान मनुष्य को अपनी पूरी ईमानदारी से अर्जित धन का दसवां भाग ईश्वर की प्रसन्नता और कल्याण के कार्यों में अवश्य लगाना चाहिए।
पुरातन काल में काम्पिल्य नगर में सुमेधा नामक एक ब्राह्मण रहता था उसकी स्त्री का नाम पवित्रा था। जो नाम के अनुरूप ही सती और साध्वी थी। परंतु यह दोनों ही बहुत गरीब थे। हालांकि वह बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे और सदा अतिथियों की सेवा में तत्पर रहते थे। एक दिन निर्धनता से दुखी होकर ब्राह्मण ने दूर देश में जाने का विचार किया उसकी पत्नी ने कहा स्वामी धन और संतान पूर्व जन्म के दान और पुण्य से ही प्राप्त होते हैं अतः इस बात की चिंता ना करें और सभी प्रभु पर छोड़ दें। तदुपरांत एक दिन महर्षि कौडिन्य उनके घर पधारे। तब दोनों ब्राह्मण दंपति ने यथाशक्ति तन मन से उनकी सेवा की। महर्षि ने उनकी गरीबी की दशा देखकर उन्होंने कहा दरिद्रता को दूर करने का बहुत ही सरल उपाय यह है कि तुम दोनों मिलकर अधिक मास में कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत तथा पांच रात्रि जागरण करो। इस एकादशी का व्रत करने से यक्षराज कुबेर धनाधेश बना है और इसी व्रत से राजा हरिश्चंद्र राजा हुए हैं। ऐसा कह कर महर्षि कौडिन्य चले गए। इसके बाद सुमेधा और उसकी पत्नी ने यह व्रत विधिपूर्वक किया। इसके बाद प्रातः काल कहीं से एक राजकुमार घोड़े पर चढ़कर आया और इसने उन दोनों धर्म परायण दंपति को देखा देखकर उसे बड़ी दया आई और उसने दोनों को सर्वसाधन संपन्न सर्व सुख समृद्धि युक्त करके एक अच्छा भवन रहने को दिया इस तरह दोनों के सभी दुख दूर हो गए।

