नैनीताल :::- गंगा दशहरा पत्र पांच ऋषियों के नामों के साथ तैयार किया जाता है। ज्योतिष आचार्य पंडित प्रकाश जोशी ने बताया इस पत्र में एक वृताकार चक्र बनाया जाता है जिसे पेंसिल और परकार की सहायता से खींचा जाता है। इसके बाद इसमें हरे और पीले जैसे रंग-बिरंगे रंगों से सजावट की जाती है। और वृत के बाहर पांच ऋषियों के नामों के साथ वज्र निवारक मंत्र लिखा जाता है। जो बहुत शक्तिशाली मंत्र है। इससे घर में आग लगने ,और आकाशीय बिजली गिरने से बचाव होता है, और नकारात्मक शक्तियां भी दूर होती हैं। देवभूमि के कुमाऊं अंचल में गांव-गांव में प्रत्येक घर में दशहरा पर्व अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। गंगा दशहरा द्वारा पत्र रंग-बिरंगे ज्यामिति डिजाइनों से अलंकृत रहते हैं। प्राचीन समय में प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया जाता था। इनमें दाड़िम, किलमोड़, अखरोट और बुरांश सहित अनेक प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया जाता था। परंतु अब बाजार से निर्मित वाटर कलरों का प्रयोग किया जाने लगा है। कुमाऊं में मान्यता है कि यह द्वार पत्र सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। और इससे घरों की प्राकृतिक आपदा और वज्रपात से सुरक्षा होती है। तथा चोरी अग्नि का भय व्याप्त नहीं रहता है।
इस बार 25 मई सोमवार को गंगा दशहरा पर्व मनाया जाएगा। इस दिन यदि दशमी तिथि की बात करें तो 59 घड़ी 42 पल अर्थात अगले दिन प्रात 5:11 बजे तक दशमी तिथि रहेगी। इस दिन उत्तरा फाल्गुनी नामक नक्षत्र 57 घड़ी सात पल अर्थात अगले दिन प्रातः 4:09 तक रहेगा। सबसे महत्वपूर्ण यदि इस दिन के चंद्रमा की स्थिति को जानें तो इस दिन प्रातः 6:07 तक चंद्र देव सिंह राशि में विराजमान रहेंगे तदुप्रांत चंद्र देव कन्या राशि में प्रवेश करेंगे।
वज्र निवारक मंत्र-:
*ॐ श्री गणेशाय नमः अगस्त्यश्च पुलस्त्यश्च वैशम्पायन एव च जैमिनीश्च सुमन्तश्च पंचैते वज्रवारका: मुने: कल्याण मित्रस्य जैमिनीश्चानु कीर्तनात् विद्युतग्निभयं नास्ति लिखितं गृह द्वारपत्रं यत्राहिशायी भगवान यत्रास्ते हरिरीश्वर: गंगोभवति वज्रस्य तत्र शूलस्य का कथा।
देवभूमि के कुमाऊं संभाग में ब्राह्मण वर्ग गंगा दशहरा पर्व से पूर्व गंगा दशहरा द्वारा पत्र हाथों से बनाकर उनमें रंग भरकर अपने यजमानों को बांटते हैं। यजमान लोग दशहरा पर्व के दिन प्रातः नदियों जल स्रोतों में स्नान कर घर आकर दशहरा द्वारा पत्र घर के दरवाजे की चौखट के ऊपर चिपकाते हैं।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार धरती पर गंगा जी का अवतरण ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को माना गया है। इसलिए इस तिथि को गंगा दशहरा का पर्व मनाया जाता है। धार्मिक दृष्टिकोण से यदि हम पर्यावरणीय नजरिये से गंगा अवतरण की कथा और गंगा दशहरा पर्व की मान्यता देखें तो हमें साफ तौर पर हिमालय सहित संपूर्ण परिवेश को बचाए रखने का संवेदनशील भाव दिखाई देता है। राजा भगीरथ के कठिन तप के बाद गंगा जब धरती पर आने के लिए राजी हो गई तो संकट इस बात का था कि गंगा के प्रचंड वेग को धरती एक साथ नहीं संभाल पाएगी। अंततः समाधान के तौर पर उपाय आया कि भगवान भोलेनाथ अपनी विशाल जटावों में गंगा के आवेग को समाहित करते करते हुए उसकी मात्र एक धारा छोड़ सकें तो धरती गंगा का वेग आसानी से संभाल सकती है। अंत में भगवान भोलेनाथ ने गंगा को जटाओं में समेटने के बाद ही छोटी धारा को धरती पर छोड़ा, जहां से प्रचंड वेग वाली गंगा विभाजित होकर अलग-अलग नदी धाराओं के रूप में उद्मित होती है। संभवत: इसीलिए हमारे देश में सप्त नदियां गंगा, जमुना, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु, कावेरी, सहित अन्य सभी छोटी-बड़ी नदियों को गंगा सदृश्य मानने की परंपरा रही है।

