नैनीताल ::-  उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में लगातार हो रहे पलायन ने कई गांवों को वीरान बना दिया है। बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से लोगों का बड़े पैमाने पर शहरों की ओर रुख करने के कारण अनेक गांव घोस्ट विलेज में तब्दील हो चुके हैं। इस स्थिति का सीधा असर सरकारी योजनाओं और बजट पर भी पड़ रहा है, जिससे ग्रामीण क्षेत्र विकास की मुख्यधारा से पीछे छूटते जा रहे हैं। इसी चुनौती से निपटने के लिए अपनी गणना अपने गांव अभियान में संयोजक जोत सिंह बिष्ट ने रविवार को नैनीताल क्लब में प्रेस वार्ता की। प्रेस वार्ता के दौरान मुख्य संयोजक जोत सिंह बिष्ट के बताया उत्तराखंड के लगभग 20 से 25 लाख प्रवासी राज्य से बाहर रह रहे हैं, जिनका मूल निवास गांवों में है। 2027 की जनगणना के दौरान 9 फरवरी से 28 फरवरी के बीच सभी प्रवासी अपने गांवों में पहुंचकर अपनी और अपने परिवार की गणना  कराएं। उन्होंने बताया कि इस संबंध में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को ज्ञापन भी सौंपा गया है, जिस पर उन्होंने विस्तृत प्रस्ताव प्रस्तुत करने को कहा है।  कहा कि जिस तरह कोविड लॉकडाउन के दौरान लोग अपने गांवों की ओर लौटे थे, उसी तरह जनगणना के समय भी गांवों में आए ताकि घटती जनसंख्या को संतुलित किया जा सके।
2011 में पर्वतीय 9 जिलों की जनसंख्या करीब 38 लाख थी, जो अब घटकर लगभग 36.5 लाख रह गई है। वहीं मैदानी 4 जिलों में जनसंख्या 61 लाख से बढ़कर 81 लाख हो गई है। इस असंतुलन के कारण पहाड़ी क्षेत्रों में विधानसभा सीटों में कटौती का खतरा बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जनसंख्या में गिरावट जारी रही, तो पंचायतों और नगर निकायों के बजट में कमी, मनरेगा सहित अन्य योजनाओं से वंचित होने जैसी समस्याएं और गहराएंगी। ऐसे में अपनी गणना अपने गांव अभियान पहाड़ के अस्तित्व और विकास के लिए एक महत्वपूर्ण पहल बनकर उभर रहा है।
प्रेस वार्ता के दौरान धना बिष्ट, पूर्व सैनिक  शोहन लाल खंडूरी रहें।

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