नैनीताल:::-  उत्तराखंड का प्रसिद्ध लोक पर्व फूलदेई रविवार को पूरे उत्साह और परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया । इस अवसर पर बच्चे फूलों से सजी थाल घर-घर जाते हैं और देहरी पर फूल व चावल बिखेरते हुए पारंपरिक लोकगीत फूल देई, छम्मा देई, दैणी द्वार भर भकार गाकर घर की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। फूल देई का अर्थ है कि घर की देहली फूलों से सुसज्जित और खुशियों से भरी रहे, छम्मा देई का मतलब घर में शांति और दया बनी रहे, दैणी द्वार का आशय है कि घर के द्वार सभी के लिए शुभ और भाग्यशाली हों जबकि भर भकार का अर्थ है कि घर में अन्न और धन का भंडार सदैव भरा रहे। गीत में ये देली बारम्बार नमस्कार, फूले द्वार कहकर घर की देहली को बार- बार प्राणन किया जाता, यह पर्व बसंत ऋतु में प्रकृति के प्रति आभार और समृद्धि की कामना का प्रतीक है। फूलदेई को प्रकृति पूजा और लोक कल्याण के उत्सव के रूप में भी देखा जाता है। इस दिन से उत्तराखंड में बेटियों को भिटोली देने की परंपरा भी शुरू हो जाती है, जो पूरे एक महीने तक चलती है।
फूलदेई का पर्व चैत्र संक्रांति के दिन मनाया जाता है।  इसी समय से चैत्र मास के साथ नववर्ष की शुरुआत मानी जाती है। इस दिन बच्चे घरों की देहली पर फूल और चावल अर्पित कर लोकगीत गाते हैं और परिवार की समृद्धि की कामना करते हैं।
फूलदेई के साथ ही उत्तराखंड में ‘भिटौली’ नाम की एक और महत्वपूर्ण परंपरा की शुरुआत होती है।  भिटौली के दौरान मायके की तरफ से अपनी शादीशुदा बेटियों के लिए उपहार, मिठाई और नए कपड़े भेजे जाते हैं। यह परंपरा बेटियों के प्रति सम्मान और माता-पिता के प्यार को दर्शाती है। पहाड़ों में इस रीति-रिवाज का आज भी बहुत ज्यादा महत्व है।

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