नैनीताल :::- कुमाऊं की होली केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि यह क्षेत्र की आत्मा, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। यहां होली की शुरुआत महाशिवरात्रि के बाद चीर बंधन के साथ होती है। इसके पश्चात गांव-गांव में होल्यार मंडलियां ढोल-दमाऊं की थाप पर मंदिरों से घर-घर जाकर होली गायन करती हैं। राग-रागिनियों से सजी बैठकी और खड़ी होली में भक्ति, श्रृंगार और लोकजीवन की अद्भुत झलक देखने को मिलती है।
होली से एक दिन पूर्व कुमाऊं के विभिन्न क्षेत्रों से होल्यार नैनीताल पहुंचकर नैना देवी मंदिर में एकत्र होते हैं। मां नैना देवी के आशीर्वाद के साथ मंदिर परिसर में खड़ी होली का आयोजन किया जाता है। ढोल की गूंज, पारंपरिक वेशभूषा और सुर-ताल का सामंजस्य वातावरण को भक्तिमय बना देता है।
चम्पावत खेतीखान की होली आयोजन एवं डॉक्यूमेंट्री निर्माण समिति के होल्यार व महासचिव देवेंद्र ओली ने बताया कि संस्था पिछले 21 वर्षों से देश के विभिन्न राज्यों में जाकर खड़ी होली का आयोजन कर रही है। साथ ही पिछले 10 वर्षों से नैना देवी मंदिर में नियमित रूप से खड़ी होली का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि खड़ी होली कुमाऊं की विशेष पहचान है, जिसे काली कुमाऊं क्षेत्र में विशेष रूप से गाया जाता है। यहां 70 से 80 प्रतिशत लोग खड़ी होली की परंपरा से जुड़े हैं।
देवेंद्र ओली ने बताया कि कुमाऊं मंडल के चम्पावत जनपद, उससे लगे नेपाल और पिथौरागढ़ क्षेत्र में खड़ी होली का विशेष महत्व है। एकादशी के दिन गाई जाने वाली इस होली में भगवान की आराधना की जाती है। यह केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का माध्यम भी है, जिसमें मन के विकारों और नकारात्मक भावनाओं को दूर कर स्वस्थ जीवन और समाज के लिए आशीर्वाद दिया जाता है।
डॉक्यूमेंट्री निर्माण समिति के अध्यक्ष गोपाल सिंह मनराल ने बताया कि वर्ष 2005 से मां नैना देवी मंदिर में खड़ी होली का गायन किया जा रहा है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी इस परंपरा में उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं। खड़ी होली के माध्यम से जहां भगवान की गाथाएं गाई जाती हैं, वहीं लोगों को नशे से दूर रहने का संदेश भी दिया जाता है। आमली एकादशी के बाद होल्यार घर-घर जाकर होली गाते हैं और लोगों को आशीर्वाद देते हैं।

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