नैनीताल:::-  आपदा प्रबन्धन प्रकोष्ठ डॉ. आरएस टोलिया उत्तराखण्ड प्रशासन अकादमी नैनीताल द्वारा आपदा  रिस्क मैनेजमेंट : स्ट्रेटेजीज फॉर हिमालयन ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लोड्स (GLOFs) विषय पर 02 दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया है।

हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के चलते ग्लेशियर झीलों के फटने और प्राकृतिक आपदाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है। उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन विभाग ने प्रदेश की 13 ग्लेशियर झीलों को खतरनाक चिह्नित किया है, जिनमें पांच झीलें बेहद संवेदनशील स्थिति में हैं। इन झीलों का सर्वेक्षण पूरा कर लिया गया है। अब संबंधित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को आपदा से बचाव के लिए जागरूक करने के साथ ही अर्ली वॉर्निंग सिस्टम स्थापित करने की तैयारी की जा रही है। वसुधारा झील में चेतावनी प्रणाली के उपकरण लगाए जा चुके हैं।
आपदा प्रबंधन अधिकारी प्रकाश चंद्र ने बताया कि प्रदेश में ग्लेशियर झीलों की स्थिति का लगातार अध्ययन किया जा रहा है। सर्वेक्षण के बाद संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को संभावित आपदा के प्रति जागरूक किया जा रहा है, ताकि आपात स्थिति में लोग समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंच सकें। उन्होंने बताया कि ग्लेशियर झीलों के फटने से पहले ही संबंधित क्षेत्रों में सूचना पहुंचाने के लिए अर्ली वॉर्निंग सिस्टम स्थापित करने की दिशा में काम किया जा रहा है। वसुधारा झील में उपकरण स्थापित किए जा चुके हैं, जबकि अन्य संवेदनशील झीलों में भी चेतावनी प्रणाली लगाने की तैयारी चल रही है।
उन्होंने बताया कि ग्लेशियर क्षेत्र में पहाड़ का हिस्सा टूटने या बर्फ पिघलने से पानी का बहाव अचानक तेज हो सकता है। ऐसे में ग्लेशियर झीलों के फटने से निकलने वाला पानी बड़े नुकसान का कारण बन सकता है। इसलिए समय रहते चेतावनी जारी करना और लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाना बेहद जरूरी है।
आपदा प्रबंधन अधिकारी ने बताया कि आपदा से निपटने के लिए आपदा मित्रों को भी प्रशिक्षित किया जा रहा है। प्रशिक्षण में एसडीआरएफ, एनडीआरएफ समेत अन्य संबंधित एजेंसियों की भूमिका रहती है। प्रशिक्षित आपदा मित्रों को आगे स्थानीय लोगों को भी आपदा से बचाव का प्रशिक्षण देने की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी, जिससे स्थानीय स्तर पर आपदा प्रबंधन की क्षमता मजबूत हो सके। उन्होंने कहा कि किसी भी आपदा की सूचना मिलते ही संबंधित टीम को तत्काल मौके पर भेजकर राहत एवं बचाव कार्य शुरू किए जाते हैं। आपदा की सूचना जितनी जल्दी मिलेगी, उतनी ही तेजी से राहत और बचाव कार्य संचालित किए जा सकेंगे।
जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहा हिमालयी क्षेत्र में आपदा का खतरा
हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के चलते ग्लेशियर झीलों का फटना, भूस्खलन और भूकंप जैसी घटनाएं गंभीर चुनौती बन रही हैं। इसे देखते हुए उत्तराखंड में राज्य स्तर पर आपदा प्रबंधन की तैयारियों को लगातार मजबूत किया जा रहा है। मॉक ड्रिल और जनजागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को आपदा से निपटने के लिए तैयार किया जा रहा है।
आपदा ज्वाइंट डायरेक्टर डॉ. महेश कुमार ने बताया कि पिछले पांच वर्षों से आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में लगातार कार्य किया जा रहा है। आपदा की स्थिति से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए राज्य स्तर पर विभिन्न योजनाओं और व्यवस्थाओं को मजबूत किया जा रहा है। इसके साथ ही मॉक ड्रिल और जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए लोगों को आपदा के प्रति जागरूक किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि हिमालय का इकोसिस्टम काफी संवेदनशील है। जलवायु परिवर्तन के कारण इस क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। उत्तराखंड के साथ ही नेपाल में ग्लेशियर झीलों के फटने की घटनाएं हो चुकी हैं, जबकि हाल ही में भूटान में भी इस तरह की घटना सामने आई है। इन घटनाओं के पीछे जलवायु परिवर्तन एक प्रमुख कारण माना जा रहा है।
डॉ. महेश कुमार ने बताया कि आपदा की दृष्टि से उत्तराखंड का अधिकांश क्षेत्र बेहद संवेदनशील है। राज्य में अर्ली वॉर्निंग सिस्टम को मजबूत किया जा रहा है, जिससे संभावित आपदाओं की समय रहते जानकारी मिल सके और लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सके। नए एप और तकनीकी व्यवस्थाओं के माध्यम से आपदा एवं भूकंप से संबंधित निगरानी और प्रबंधन पर उच्च स्तर पर कार्य किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि आपदा की दृष्टि से नैनीताल जोन-5 में आता है और यह क्षेत्र काफी संवेदनशील है। नैनीताल में बढ़ती आबादी और भारी निर्माण कार्यों के चलते जोखिम और अधिक बढ़ रहा है। ऐसे में क्षेत्र की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए आपदा प्रबंधन की तैयारियों को मजबूत करना बेहद जरूरी है।

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