नैनीताल:::-   शारदीय नवरात्र का पर्व मां दुर्गा की आराधना, शक्ति और भक्ति का प्रतीक है। नवरात्र के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक आस्था के इस पर्व में श्रीरामलीला का आयोजन भी भारतीय संस्कृति, मर्यादा और अधर्म पर धर्म की विजय के संदेश को और महत्वपूर्ण बनाता है।
प्रो. ललित तिवारी बताते है पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब महिषासुर जैसे राक्षसों के अत्याचार बढ़ने लगे, तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश सहित देवताओं की सामूहिक शक्ति से मां दुर्गा प्रकट हुईं। उन्होंने महिषासुर, शुंभ-निशुंभ और अन्य दानवों का संहार कर देवताओं और समस्त सृष्टि की रक्षा की। इसी कारण मां दुर्गा को शक्ति, संरक्षण और अधर्म के विनाश की देवी माना जाता है।
मां दुर्गा को आदिशक्ति का स्वरूप माना जाता है। उनके हाथों में विराजमान त्रिशूल, चक्र, गदा, धनुष और तलवार जैसे दिव्य अस्त्र बुराई पर विजय तथा धर्म की रक्षा के प्रतीक हैं। उनका सिंह वाहन साहस, पराक्रम और दृढ़ संकल्प का संदेश देता है। मां के तीन नेत्र इच्छा, कर्म और ज्ञान के प्रतीक माने जाते हैं।
नवदुर्गा के नौ स्वरूप
नवरात्र में प्रथम दिन मां शैलपुत्री, द्वितीय दिन ब्रह्मचारिणी, तृतीय दिन चंद्रघंटा, चतुर्थ दिन कूष्मांडा, पंचम दिन स्कंदमाता, षष्ठम दिन कात्यायनी, सप्तम दिन कालरात्रि, अष्टम दिन महागौरी और नवम दिन सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। मां के ये नौ स्वरूप जीवन में संयम, तपस्या, साहस, ऊर्जा, करुणा और आध्यात्मिक सिद्धि का संदेश देते हैं।
मां दुर्गा को अम्बे, जगदम्बा, भगवती और महिषासुर मर्दिनी सहित अनेक नामों से पुकारा जाता है। दुर्गा सप्तशती और मार्कण्डेय पुराण में भी मां की महिमा का वर्णन मिलता है।
नवरात्र केवल धार्मिक अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि नारी शक्ति के सम्मान, सकारात्मक ऊर्जा और सत्य की राह पर चलने की प्रेरणा भी देता है।

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