नैनीताल:::- सावन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस वर्ष पुत्रदा एकादशी का व्रत दो दिन मनाया जाएगा। शैव संप्रदाय के गृहस्थ श्रद्धालु 23 अगस्त, रविवार को, जबकि वैष्णव संप्रदाय के अनुयायी 24 अगस्त, सोमवार को व्रत रखेंगे। ज्योतिषाचार्य पंडित प्रकाश जोशी के अनुसार 23 अगस्त को एकादशी तिथि प्रातः 4:19 बजे से प्रारंभ होगी। इस दिन मूल नक्षत्र शाम 5:45 बजे तक रहेगा और चंद्रमा धनु राशि में स्थित रहेगा।
पुत्रदा एकादशी को संतान सुख की कामना से किए जाने वाले महत्वपूर्ण व्रतों में माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस व्रत के प्रभाव से संतान प्राप्ति की मनोकामना पूर्ण होती है। व्रत के दौरान भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना, उपवास और रात्रि जागरण किया जाता है। द्वादशी तिथि को विधि-विधान से व्रत का पारण किया जाता है।
राजा महीजित की कथा
पुत्रदा एकादशी की कथा के अनुसार द्वापर युग के आरंभ में महिष्मति नगरी में राजा महीजित राज्य करते थे। राजा धर्मात्मा और प्रजा का पुत्रवत पालन करने वाले थे, लेकिन संतान न होने के कारण अत्यंत दुखी रहते थे। संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने अनेक प्रयास किए, लेकिन सफलता नहीं मिली।
राजा की समस्या का समाधान खोजने के लिए प्रजा के प्रतिनिधि वन में ऋषि-मुनियों के पास पहुंचे। वहां उन्हें महात्मा लोमश ऋषि के दर्शन हुए। ऋषि ने राजा के पूर्व जन्म का वृत्तांत बताते हुए कहा कि पूर्व जन्म में राजा एक निर्धन वैश्य थे। एक बार ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी के दिन उन्होंने एक प्यासी गाय को जल पीने से हटा दिया था। इसी कर्म के कारण वर्तमान जन्म में उन्हें संतान वियोग का दुख भोगना पड़ रहा है।
लोमश ऋषि ने प्रजा को श्रावण शुक्ल एकादशी अर्थात पुत्रदा एकादशी का व्रत करने और रात्रि जागरण करने का उपाय बताया। ऋषि के निर्देश पर प्रजा ने श्रद्धापूर्वक व्रत किया और उसका पुण्य राजा को समर्पित किया। धार्मिक कथा के अनुसार इसके प्रभाव से रानी ने गर्भ धारण किया और एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया।
ज्योतिषाचार्य पंडित प्रकाश जोशी ने बताया कि धार्मिक मान्यता के अनुसार पुत्रदा एकादशी का व्रत श्रद्धा और विधि-विधान से करने तथा भगवान विष्णु की आराधना करने से संतान सुख की कामना पूरी होती है।

