नैनीताल:::-  कुमाऊं अंचल में बिरुड़ पंचमी और सातों-आठों का पर्व धार्मिक आस्था, लोकपरंपरा और पारिवारिक संस्कारों से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व है। इस दौरान महिलाएं संतान सुख, परिवार की समृद्धि और सुख-शांति की कामना के लिए विधि-विधान से व्रत एवं पूजा करती हैं। पंडित प्रकाश जोशी ने बताया मां नंदा और गमरा को शक्ति स्वरूप मानकर उनकी आराधना की जाती है।
बिरुड़ पंचमी के अवसर पर पांच प्रकार के अनाज—भट्ट, उड़द, चना, गेहूं आदि—को भिगोया जाता है। सप्तमी के दिन महिलाएं समूह में बिरुड़ से भरे पात्र सिर पर रखकर नदी, धारे या नौले तक जाती हैं। जलस्रोत के समीप घास से गमरा की आकृति बनाई जाती है, जिसकी रोली, अक्षत, धूप, पुष्प, फल और मिष्ठान से पूजा की जाती है। इसके बाद बिरुड़ धोकर पूजा-अर्चना की जाती है।
कुमाऊं की इस परंपरा की खास पहचान लोकगीत हैं। महिलाएं गमरा के जन्म से लेकर उनके ससुराल जाने तक की कथा को लोकगीतों के माध्यम से प्रस्तुत करती हैं। गीतों में सास-बहू के संवाद के साथ गमरा की भक्ति और पारिवारिक जीवन का भावपूर्ण चित्रण मिलता है। कुंवारी कन्याओं द्वारा गमरा की मूर्ति बनाकर उसे कुमाऊंनी वेशभूषा और आभूषणों से सजाया जाता है। मूर्ति को डलिया में रखकर सिर पर धारण करते हुए शंख-घंटी की ध्वनि के बीच घर के आंगन में लोकगीत गाए जाते हैं और बिरुड़ अर्पित किए जाते हैं।
इसके अगले दिन महेश्वर की आकृति बनाई जाती है, जिन्हें स्थानीय भाषा में कहीं ‘मैसू’ तो कहीं ‘मैसर’ कहा जाता है। ब्राह्मणों द्वारा स्तोत्र पाठ और प्राण प्रतिष्ठा के बाद गौरा के साथ मैसर को भी डलिया में स्थापित कर पूजा की जाती है। इस अवसर पर ‘मुक्ताभरण सप्तमी’ के अंतर्गत पट्टे पर पारंपरिक चित्रांकन की भी परंपरा है।

ज्योतिषाचार्य पंडित प्रकाश जोशी ने बताया  17 अगस्त ( सोमवार ) को बिरुड़ पंचमी मनाई जाएगी। इसी दिन सौरमास के अनुसार भाद्रपद माह का प्रारंभ होगा। कुमाऊं में इसी दिन घी संक्रांति यानी घ्यू त्यार या ओल्गिया का पर्व भी मनाया जाएगा।
19 अगस्त 2026, बुधवार को मुक्ताभरण सप्तमी एवं संतान सप्तमी (सातूं व्रत) और 20 अगस्त 2026, गुरुवार को दुर्वा अष्टमी (आठूं व्रत) मनाया जाएगा।

संतान सप्तमी की पौराणिक कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को इस व्रत का महत्व बताया था। मान्यता है कि मथुरा में लोमस ऋषि के आगमन पर देवकी और वसुदेव ने उनकी श्रद्धापूर्वक सेवा की। प्रसन्न होकर ऋषि ने उन्हें संतान सप्तमी व्रत की विधि और कथा बताई।
कथा के अनुसार अयोध्या के राजा नहुष की पत्नी चंद्रमुखी और एक ब्राह्मण की पत्नी रूपवती आपस में सखियां थीं। एक दिन सरयू नदी में स्नान के दौरान उन्होंने महिलाओं को भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करते देखा। पूछने पर उन्हें संतान सप्तमी व्रत का महत्व बताया गया। दोनों ने व्रत करने का संकल्प लिया, लेकिन घर लौटने के बाद रानी चंद्रमुखी व्रत भूल गईं।
मान्यता है कि अगले जन्म में दोनों को अपने कर्मों का फल मिला। बाद में मनुष्य योनि में जन्म लेने पर रानी को संतान सुख नहीं मिला, जबकि उनकी सखी भूषणा को आठ स्वस्थ पुत्र प्राप्त हुए। रानी ने ईर्ष्या में भूषणा के बच्चों को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया, लेकिन सफल नहीं हुईं। भूषणा ने उन्हें पिछले जन्म की घटना और व्रत के महत्व की याद दिलाई।
इसके बाद रानी ने विधि-विधान से संतान सप्तमी अर्थात मुक्ताभरण व्रत किया और मान्यता के अनुसार उन्हें भी संतान सुख प्राप्त हुआ। इसी कारण लोकमान्यता में इस व्रत को संतान सुख, परिवार की समृद्धि और सौभाग्य से जोड़कर देखा जाता है।
ज्योतिषाचार्य पंडित प्रकाश जोशी ने बताया कि कुमाऊं की यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति, लोकगीत, पारिवारिक भावनाओं और सामाजिक एकजुटता का भी प्रतीक है। परंपरा के अनुसार एक बार व्रत का संकल्प लेने के बाद इसे प्रतिवर्ष करने की मान्यता है।

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